हरीश रावत बनेंगे कांग्रेस की ताकत या 2027 से पहले संकट? हाईकमान के सामने बड़ी चुनौती

2027 की जंग से पहले हरदा की सक्रियता: कांग्रेस के लिए संजीवनी या संकट?
हाईकमान की आपत्ति के बाद पीछे हटने को तैयार नहीं है हरीश
कांग्रेस के सत्ता हासिल करने के इरादे पर फिर सकता है पानी
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता हरीश रावत पिछले करीब एक सप्ताह से जिस तरह सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, उसने प्रदेश कांग्रेस के राजनीतिक समीकरणों को गरमा दिया है। पार्टी के निर्धारित कार्यक्रमों से अलग उनके दौरे और राजनीतिक गतिविधियां जहां उनके समर्थकों को उत्साहित कर रही हैं, वहीं पार्टी हाईकमान की नाराजगी और प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की आपत्ति ने इन गतिविधियों को एक अलग राजनीतिक अर्थ दे दिया है।
हरीश रावत की सक्रियता का संदेश क्या है?
हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े जनाधार वाले नेताओं में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री रहने के कारण राज्य के लगभग सभी क्षेत्रों में उनका व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क है। ऐसे में उनका अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय होना महज व्यक्तिगत राजनीतिक कार्यक्रम नहीं माना जाएगा।
2027 में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा को सत्ता से हटाने की नहीं, बल्कि एकजुट नेतृत्व, मजबूत संगठन और स्पष्ट चुनावी नैरेटिव तैयार करने की भी है। हरीश रावत की सक्रियता इस दिशा में कांग्रेस के लिए अतिरिक्त ऊर्जा पैदा कर सकती है—लेकिन तभी, जब पार्टी इसे संगठन के साथ जोड़कर चलाए।
हाईकमान की नाराजगी बन सकती है दोधारी तलवार
यदि पार्टी नेतृत्व को लगता है कि हरीश रावत की गतिविधियां संगठनात्मक अनुशासन से बाहर जा रही हैं, तो इससे कांग्रेस में गुटीय तनाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, हरीश रावत को अत्यधिक नियंत्रित करने की कोशिश भी कांग्रेस के लिए नुकसानदेह हो सकती है। रावत समर्थकों के बीच यह संदेश जा सकता है कि पार्टी अपने ही वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस नहीं दे रही।
यानी कांग्रेस के सामने ‘अनुशासन बनाम जनाधार’ का संतुलन साधने की चुनौती है।
2027 के चुनाव पर तीन संभावित असर
पहला—यदि मतभेद बढ़े तो नुकसान:
रावत और प्रदेश नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती है तो कांग्रेस का चुनावी अभियान शुरू होने से पहले ही गुटबाजी का शिकार हो सकता है। टिकट वितरण के समय यह संकट और गंभीर हो सकता है।
दूसरा—यदि समझौता हुआ तो फायदा:
यदि हाईकमान हरीश रावत की राजनीतिक सक्रियता को पार्टी के व्यापक चुनावी अभियान का हिस्सा बना देता है, तो वह कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण ‘मास लीडर’ की भूमिका निभा सकते हैं। पहाड़ से लेकर तराई तक उनकी राजनीतिक पहुंच पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में मदद कर सकती है।
तीसरा—यदि नेतृत्व का सवाल खुला रहा तो असमंजस:
2027 के चुनाव में कांग्रेस का सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि पार्टी का चेहरा कौन है और सत्ता में आने की स्थिति में नेतृत्व किसके हाथ में होगा। यदि यह सवाल चुनाव तक अनसुलझा रहा, तो भाजपा कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को बड़ा चुनावी मुद्दा बना सकती है।
भाजपा को मिल सकता है राजनीतिक हथियार
कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान भाजपा के लिए अवसर बन सकती है। भाजपा चुनाव में यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि कांग्रेस के पास सत्ता का स्पष्ट रोडमैप और नेतृत्व की एकजुटता नहीं है।
इसके विपरीत, कांग्रेस के पास भी भाजपा के खिलाफ मजबूत राजनीतिक मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों का प्रभाव तभी बढ़ेगा जब पार्टी अपने नेताओं को एक मंच पर खड़ा कर सके।
रावत की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं
हरीश रावत की उम्र और लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उत्तराखंड की राजनीति में उनका प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। वे कांग्रेस के उन नेताओं में हैं जिनकी व्यक्तिगत पहचान पार्टी के चुनाव चिह्न से आगे जाती है।
इसलिए 2027 से पहले कांग्रेस के लिए बेहतर रणनीति शायद यह होगी कि हरीश रावत की सक्रियता को रोकने के बजाय उसे पार्टी की चुनावी रणनीति में समाहित किया जाए।
निष्कर्ष
2027 की लड़ाई में कांग्रेस के लिए हरीश रावत समस्या भी बन सकते हैं और समाधान भी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी नेतृत्व उनके साथ किस तरह का राजनीतिक तालमेल बनाता है।
यदि रावत की सक्रियता को अनुशासनहीनता मानकर टकराव बढ़ाया गया तो कांग्रेस को चुनाव से पहले ही नुकसान हो सकता है। लेकिन यदि हाईकमान, प्रदेश संगठन और रावत के बीच सम्मानजनक राजनीतिक समझ बनती है, तो यही सक्रियता कांग्रेस के लिए चुनावी ताकत में बदल सकती है।



